


छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में तक़नीकी शिक्षा का संस्थान केआईटी यानि किरोड़ीमल इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलाजी की स्थापना को तक़रीबन पच्चीस साल का वक़्त हो गया, मगर इस संस्थान के संचालन के स्थायित्व को लेकर संदेह बना हुआ है, साथ ही बीते लगभग पांच साल से यहां लगभग 70 की तादाद में कार्यरत स्टाफ़ को वेतन भी नहीं मिल रहा है। 2018 में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में पहले कांग्रेस ने और फिर 2023 के विधानसभा चुनावों के दौरान बीजेपी ने वादा किया था कि केआईटी की समस्या का स्थायी निदान हर हाल में किया जायेगा। वादा तो ऑटोनामस से सरकारी करने का भी था, मगर अब तक इस दिशा में सरकारी प्रयास नाकाफ़ी ही दिखाई दे रहे हैं, जबकि केआईटी का स्टाफ़ आज भी विपरीत परिस्थितियों में भी अपने स्थानीय क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक अधिकारियों और सरकार से बेहतर की उम्मीद बांधकर बैठा है। क़ायदे से तो केआईटी का पहले ही सरकारीकरण हो जाना था, मगर सरकारीकरण का लाभ केजी पोलीटेक्निक को मिल गया, ये थोड़ी लंबी कहानी है इसलिये फिर कभी, फ़िलहाल केआईटी के पास ऑटोनामस होते हुए स्थायी संपत्ति के तौर पर ज़मीन भवन वर्कशाॅप मिलाकर करोड़ों के एसेट्स हैं, जिनको बचाकर व्यवस्थित करने के लिये संस्था का सरकारीकरण ज़रूरी है, इससे स्टाफ़ को भी राहत मिल सकेगी। बहरहाल, बीते तक़रीबन 32 महीनों से केआईटी के 70 की तादाद में स्टाफ़ को 32 महीने से वेतन नहीं मिल रहा है, जिसके कारण इन कर्मचारियों के सामने परिवार के पालन पोषण को लेकर आर्थिक संकट बना हुआ है। इन विषम परिस्थितियों से उबारने के लिए केआईटी स्टाफ़ के प्रति हमारे जनप्रतिनिधियों और सरकार को संवेदनशील होने की ज़रूरत है।
