




रायगढ़ नगर निगम में पहले निर्वाचित महापौर जेठूराम मनहर एक प्रतिबद्ध कांग्रेसी रहे हैं, बतौर महापौर उनका कार्यकाल दूसरे महापौरों की तुलना में काफी हद तक बेदाग़ रहा है, जेठूराम का सहज सरल मिलनसार व्यक्तित्व उन्हें औरों से थोड़ा अलग बनाता है। जेठूराम मनहर ने लंबे समय तक अपनी मातृ संस्था कांग्रेस में ख़ुद को उपेक्षित महसूस किया और भारी मन से कुछ महीने पहले कांग्रेस को गुड बाय कह दिया। हालांकि अब तक वो किसी दूसरी राजनैतिक पार्टी में नहीं गये हैं। शहर की राजनीति से गहरे वास्ता रखने वाले कुछ लोगों का कहना है कि “कांग्रेस छोड़ने में जेठूराम मनहर जल्दबाज़ी कर गये आज अगर वो कांग्रेस में होते, तो महापौर की टिकट पार्टी उनके घर पहुंचाने जाती।” बावजूद इसके पूर्व महापौर जेठूराम मनहर का अनुसूचित जाति वर्ग के अलावे समाज के हर वर्ग में लगातार जन संपर्क बना हुआ है, जिससे काफ़ी हद तक साबित होता है कि जेठूराम मनहर शहरी युवा मतदाताओं के बीच अच्छी दखल रखते हैं और लोग उनको सुनते हैं। ऐसी परिस्थितियों को देखते हुए ये भी मानना होगा कि कांग्रेस से इस्तीफ़े के बाद शांत चित्त होकर जेठूराम मनहर ख़ुद को इस निगम चुनाव में “गेम चेंजर” की तरह तैयार कर चुके हैं, लिहाज़ा जेठूराम मनहर को हल्के में लेना आज की तारीख़ में कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए ख़तरे की घंटी साबित हो सकता है।
ख़बर ये भी है कि उमेश पटेल के ख़ास सिपहसालार नगेंद्र नेगी के कांग्रेस में ग्रामीण जिलाध्यक्ष बनने के बाद जेठूराम मनहर को कांग्रेस में वापस लाने की क़वायद तेज़ हो गई है, वहीं भाजपा भी जेठूराम मनहर को अपने पक्ष में लाने के लिए अघोषित गुमास्तों को उनके पीछे छोड़ चुकी है। बहरहाल, अब देखने वाली बात हे होगी कि जेठूराम मनहर नाम का यह प्रभावशाली ऊंट किस करवट बैठता है। जिस करवट भी बैठेगा, उधर फ़ायदा होना तो तय है, यह दावा इसलिए भी क्योंकि जेठूराम मनहर में शहर के अच्छे ख़ासे वोट बैंक को प्रभावित करने की ताक़त तो है….