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निगम में अब तक कांग्रेस-भाजपा की जुगलबंदी और ठेकेदार नेताओं की वजह से हुआ है शहर का बंटाधार, जनता की अदालत में तो देना होगा जवाब….

इस बात में कोई दो राय नहीं कि 2019 में शहर सरकार की गद्दी पर बहुमत के आंकड़े के साथ काबिज़ होने वाली कांग्रेस शुरूआती 6 महीने के बाद से ही आपसी गैंगवार का शिकार हो गई थी, वहीं भारतीय जनता पार्टी की टिकट पर चुनाव जीतकर आये पार्षदों में कई प्रमुख चेहरों ने शहर सरकार के एक धड़े से हाथ मिला लिया था, शहर को बुनियादी सुविधाओं से दूर करने में शहर सरकार और विपक्ष का यही गठजोड़ सबसे बड़ा कारण साबित हुआ, हालांकि 2023 में विधानसभा चुनावों से पहले जब ओपी चौधरी ने अपनी टिकट फ़ाईनल होने के पहले मोर्चा संभाला, तो भाजपाई पार्षदों को ना चाहते हुए भी कांग्रेस नेतृत्व वाली शहर सरकार की ख़िलाफ़त का झंडा उठाना पड़ा।

मेयर इन कौंसिल की खींचतान पूरे पांच सालों तक देखने को मिली, इससे कांग्रेस बच नहीं सकती, वार्ड नंबर 25 के उप चुनाव में जिसके दम पर कांग्रेस प्रत्याशी चुनाव जीतकर आई, एक समय के बाद अतिक्रमण को संरक्षण देते हुए, निजी कालोनाईजर्स के हाथों की कठपुतली बन अपने उसी नेता की खुली ख़िलाफ़त करने लगी, हालांकि कार्यकाल के अंतिम दौर में उसे थोड़ी अकल आई। अपने तत्कालीन विधायक के साथ कांग्रेस की महापौर सभापति और पार्षदों के मतभेद जग ज़ाहिर हैं, यही कारण है कि मुख्यमंत्री की घोषणा पर राज्य शासन द्वारा 14 करोड़ की राशि रिलीज़ करने के बाद भी संजय काम्प्लेक्स के पुनर्निर्माण के लिए एक ईंट तक नहीं रखी जा सकी, इसका हिसाब विधानसभा चुनाव में जनता ने मांगा और मौजूदा निगम चुनाव में भी मांगेगी।

जब से रायगढ़ नगर निगम अस्तित्व में आया, तभी से चाहे जिसकी सरकार रही हो, सड़क-बिजली-पानी-साफ़ सफ़ाई और ढांचागत विकास के लिहाज़ से जो भी निर्माण कार्य हुए, उनमें कांग्रेस भाजपा के ही ठेकेदार बन चुके कार्यकर्ताओं की मिलीभगत सामने आई, हालांकि इस नेक्सस में अधिकारी भी शामिल रहे, यही कारण है कि अब तक शहर में कोई भी ढांचागत निर्माण कार्य गुणवत्ता के साथ नहीं हो सका। इस बात में कोई दो राय नहीं कि अब जो भी निर्माण कार्य हो रहे हैं, उनको बाहरी ठेकेदारों से करवाया जा रहा है, नतीजा ये निकलकर आ रहा है कि पहली बार शहर की जनता दो परतों वाली इतनी मोटी बीटी सड़क को बनते हुए देख पा रही है, बाक़ी निर्माण कार्यों की गुणवत्ता को भी साईट पर जाकर सीधे देखा जा सकता है। क़ायदे से देखा जाये तो विकास कार्यों को लेकर हमारे जन प्रतिनिधियों का नज़रिया ऐसा ही होना चाहिए।

बहरहाल, मौजूदा निगम चुनाव के लिए भारतीय जनता पार्टी अपने विधायक के नेतृत्व में कमर कसकर आगे बढ़ती जा रही है, मगर क्या विधानसभा चुनावों में सत्ता से वंचित होकर बिखराव का दंश झेल रही कांग्रेस अपने जनाधार वाले नेताओं को साथ लेकर चुनाव लड़ पाने की स्थिति में है?

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