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केलो महाआरती उत्सव ने ले लिया है परंपरा का रूप, आठवें साल के आयोजन के लिए छत्तीसगढ़ सांस्कृतिक मंच ने शुरू की तैयारी

बीते सात सालों से चौदह जनवरी मकर संक्रांति पर छत्तीसगढ़ सांस्कृतिक मंच ने रायगढ़ की लाईफ़-लाईन केलो नदी की महाआरती की परंपरा शुरू की है। महापर्व के रूप में आयोजित की वाली केलो महाआरती का यह आठवां साल है और इस साल भी केलो महाआरती को भव्यता के साथ किये जाने का निर्णय लिया गया है। आठ जनवरी की सुबह से ही केलो महाआरती के घाट के आसपास आयोजन समिति ने व्यवस्था के लिहाज़ से गहन निरीक्षण किया और साफ़ सफ़ाई को लेकर निगम तंत्र को आग्रह किया है कि हर साल की तरह इस साल भी राजमहल और बेलादुला को मिलाकर दोनों तटों की व्यापक सफ़ाई की जाये। इस साल भी केलो माता के प्रतीकात्मक मंदिर की भी साफ़ सफ़ाई रंगाई पोताई होगी। छत्तीसगढ़ सांस्कृतिक मंच के संयोजक और केलो महाआरती के सूत्रधार सभापति जयंत ठेठवार, दयाराम धुर्वे, प्रभात साहू, आशीष जायसवाल, विनायक षड़ंगी, लखेश्वर मिरी, मनोज पटनायक, हेमंत देवांगन, मोहम्मद आरिफ़ सहित कई समर्पित सदस्यों ने बुधवार को केलो महाआरती घाट के पास महत्वपूर्ण बैठक कर महोत्सव की तैयारियों में तेज़ी लाने का निर्णय लिया। केलो महाआरती महोत्सव के संयोजक जयंत ठेठवार ने ख़बर बयार को बताया है कि “यह आयोजन किसी एक व्यक्ति या संस्था का ना होकर शहर के उन तमाम लोगों का है, जिनकी आस्था केलो मैया के प्रति है और यह भव्य आयोजन स्वत: स्फ़ूर्त व्यापक जन सहयोग से ही संभव हो पाता है।”

वैसे देखा जाये तो केलो को मां का दर्ज़ा देकर हम भले ही अपनी आस्था का इज़हार करते हैं, मगर सच्चाई ये भी है कि केलो को कुरूप बनाने के लिये भी हम ही ज़िम्मेदार हैं, क्योंकि केलो के दोनों तटों में हर दस क़दम पर कचरे और गंदगी का आलम देखने को मिलता है। कारखानों से निकलने वाला वेस्ट केलो में तो छोड़ा ही जाता है, पूरे शहर का गंदा पानी नाली नालों से होता हुआ आज भी केलो के गर्भ में समा रहा है। केलो अपनी बदहाली के लिये पूरी तरह अभिशप्त है, जब तक केलो के उद्धार के लिये हमारे जन प्रतिनिधि ईमानदारी से नहीं जुटेंगे और प्रशासन पर केलो के स्थायी तौर पर उद्धार के लिये दबाव नहीं बनेगा, तब तक हमें साल में एक बार केलो मैया की महाआरती करके ही संतुष्ट और ख़ुश होते रहना पड़ेगा। ये अलग बात है कि चौदह जनवरी के बाद हमारी केलो मैया उपेक्षा का दंश झेलती रहती है।

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