



रायगढ़। दरोगापारा के सर्व गुजराती समाज के पारंपरिक रासगरबा उत्सव की तो बात ही निराली है, बीते तक़रीबन तीस सालों से यहां रास-गरबा का पारंपरिक आयोजन शारदीय नवरात्र मे नौ दिनों तक किया जाता है, हर साल की तरह इस साल भी नवरात्रि के पहले दिन से ही गुजराती समाज का रास गरबा पारंपरिक अंदाज़ में शुरू हो चुका है, हर दिन शाम के वक़्त तय समय पर गरबा शुरू हो जाता है, जिसमें गुजराती समाज के लोग अंबे माता की पूजा करते हैं और फिर शुरू होता है देर रात तक के लिये गुजराती समाज के पारंपरिक रास गरबा का दौर, रायगढ़ में मेन पोस्ट ऑफ़िस के पीछे गुजराती समाज के पारंपरिक रास गरबा कार्यक्रम ने हर शारदीय नवरात्र में परंपरा का स्वरूप ले लिया है और इस परंपरा को गुजराती समाज के लोग पूरी श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ निभाते जा रहे हैं। दरोगापारा गुजराती समाज के रास गरबा पंडाल में नवरात्रि के दौरान हर दिन क्रमशः भीड़ बढ़ती जाती है, सप्तमी अष्टमी और नवमी तिथि में गुजराती समाज की महिलाएं और युवतियां पारंपरिक वेशभूषा में रास गरबा करती हैं, यहां का रास गरबा देखने के लिए शहर के अलग-अलग हिस्सों से लोग पहुंचते हैं, जिनके बैठने के लिए विशेष व्यवस्था गुजरती रास गरबा आयोजन समिति द्वारा की जाती है। तक़नीक और सुविधाओं के लिहाज़ से पूरी गति के साथ आगे बढ़ते दौर में बहुत कुछ बदल चुका है और यह बदलाव पारंपरिक रास गरबा के आयोजन में सजावट से लेकर मातारानी की सामूहिक आराधनना के लिए बजाये जाने वाले गीतों और संचार माध्यमों के रूप में साफ़ देखा जा सकता है। रास गरबा के लिए आने वाले माता के भक्तों की वेशभूषा और रूप सज्जा में भी समय के साथ काफी बदलाव दिखाई दे रहा है। बावजूद इसके समूचे गुजराती समाज में परंपरागत रास गरबा को लेकर मां जगदंबे के प्रति अगाध श्रद्धा के साथ उल्लास का वातावरण बना हुआ है।





































