हिंडाल्को के सीएसआर विभाग द्वारा नवसृजन एनजीओ और स्वास्थ्य विभाग के सहयोग से स्वास्थ्य सशक्तिकरण श्रृंखला “आरोग्य दीप अभियान” के तीसरे चरण के तहत विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस का आयोजन बीते 10 अक्टूबर को मीलूपारा के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में किया गया। यह कार्यक्रम ख़ासतौर पर किशोरों के लिए आयोजित किया गया था। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मीलूपारा सरपंच उद्धव भगत थे, अध्यक्षता शाला विकास समिति के अध्यक्ष भीखलाल नायक ने की और विशिष्ट अतिथि के तौर पर विद्यालय की प्राचार्या श्रीमती इलिस्बा एक्का, हिंडाल्को इंडस्ट्रीज लिमिटेड के सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) विभाग प्रमुख श्रीमती रंजना नाग, गांव के गणमान्य सदस्य शंकर पटेल, ओतराम सिदार की गरिमामय मौजूदगी रही। ज्ञान की देवी माता सरस्वती की पूजा अर्चना के साथ कार्यक्रम की औपचारिक शुरूआत हुई, तत्पश्चात सभी अतिथियों का स्वागत किया गया। हिंडाल्को इंडस्ट्रीज लिमिटेड गारेपेलमा के सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) विभाग प्रमुख श्रीमती रंजना नाग द्वारा “आरोग्य दीप 3.0” कार्यक्रम के विषय में विस्तार से बताया गया और आज की परिस्थितियों में मानसिक स्वास्थ्य की आवश्यकता को देखते हुए इस विषय को कार्यक्रम में जोड़ने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया गया। स्कल की प्राचार्या द्वारा बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को ज़रूरी बताते हुए स्कूल के बच्चों के लिए इस कार्यक्रम को संचालित करने हेतु हिंडाल्को इंडस्ट्रीज लिमिटेड और नवसृजन शिक्षा एवं जन सेवा समिति को धन्यवाद भी दिया। मीलूपारा सरपंच द्वारा आरोग्य दीप कार्यक्रम के सफ़लतम तीसरे वर्ष में प्रवेश और इस कार्यक्रम से गांव के लोगों को उनके गांव में स्वास्थ्य लाभ दिलाने के लिए आयोजकों को धन्यवाद देते हुए इसे लगातार संचालित करते रहने का सुझाव दिया गया। शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर प्रतिबद्धता से काम कर रही ग़ैर सरकारी संस्था (एनजीओ) के बेहद सक्रिय और अनुभवी सचिव दुर्गा शंकर नायक द्वारा “किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य” कार्यक्रम का उद्देश्य,समस्याएँ, कारण, लक्षण और समाधान विषय पर रोचक कथाओं के माध्यम से बच्चों का उन्मुखीकरण किया गया। श्री नायक ने बताया कि “पढ़ाई, परीक्षा, करियर, पारिवारिक अपेक्षाओं और भविष्य को लेकर अत्यधिक चिंता करना। लंबे समय तक उदास रहना, निराशा महसूस करना, किसी काम में रुचि न लेना तथा स्वयं को अकेला समझना। अपने रूप-रंग, शारीरिक बनावट, शैक्षणिक प्रदर्शन या दूसरों से तुलना के कारण स्वयं को कमतर समझना। ऑनलाइन तुलना, साइबर बुलिंग, नींद में कमी और वास्तविक सामाजिक संबंधों से दूरी जैसी समस्याएँ। अत्यधिक चिड़चिड़ापन, गुस्सा, आक्रामकता, झूठ बोलना, पढ़ाई से दूरी बनाना या सामाजिक गतिविधियों में भाग न लेना। तनाव, साथियों के दबाव या जिज्ञासा के कारण तंबाकू, शराब अथवा अन्य नशीले पदार्थों की ओर आकर्षित होना। कुछ किशोरों में जुनूनी विचार एवं बाध्यकारी व्यवहार (OCD), गंभीर मनोवैज्ञानिक परेशानियाँ या पहले से मौजूद ध्यान एवं सीखने संबंधी कठिनाइयाँ भी हो सकती हैं। यही सारी परिस्थितियां किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं और इसी वजह से उनके मानसिक विकास में अवरोध पैदा होता है इसलिए यह समझना ज़रूरी है कि हर किशोर का व्यवहार एक जैसा नहीं होता। कभी-कभी उदासी, गुस्सा या चिंता होना सामान्य है, लेकिन जब ये समस्याएँ लंबे समय तक बनी रहें और दैनिक जीवन को प्रभावित करने लगें, तो उन पर ध्यान देना जरूरी है।” श्री नायक ने किशोरों में मानसिक समस्याओं के प्रमुख कारणों का ज़िक्र करते हुए आगे बताया कि किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर अनेक कारक एक साथ प्रभाव डाल सकते हैं, उन्होंने इसके प्रमुख कारणों का बिन्दुवार उल्लेख किया, जो कुछ इस रूप में सामने आया।
पढ़ाई एवं करियर का दबाव: अच्छे अंक लाने, प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होने और भविष्य में बेहतर करियर बनाने की अपेक्षाएँ किशोरों में तनाव बढ़ा सकती हैं।
पारिवारिक वातावरण: माता-पिता के बीच विवाद, परिवार में तनाव, अत्यधिक नियंत्रण, बार-बार डांटना, तुलना करना या बच्चों की भावनाओं को महत्व न देना मानसिक परेशानी का कारण बन सकता है।
साथियों का दबाव: दोस्तों द्वारा स्वीकार किए जाने की इच्छा, उपहास का डर, बुलिंग और सामाजिक समूह से बाहर किए जाने की आशंका किशोरों को प्रभावित कर सकती है।
सोशल मीडिया एवं डिजिटल जीवन: दूसरों की सफलता, सुंदरता और जीवनशैली से लगातार तुलना करना, ऑनलाइन उत्पीड़न तथा देर रात तक मोबाइल का उपयोग करना मानसिक स्वास्थ्य और नींद पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
शारीरिक एवं हार्मोनल परिवर्तन: किशोरावस्था में होने वाले शारीरिक बदलाव, शरीर की बनावट को लेकर असंतोष और अपनी पहचान को लेकर असमंजस भावनात्मक तनाव बढ़ा सकते हैं।
हिंसा, दुर्व्यवहार एवं प्रतिकूल अनुभव: शारीरिक या भावनात्मक उत्पीड़न, यौन शोषण, उपेक्षा, किसी प्रियजन की मृत्यु अथवा अन्य दर्दनाक अनुभव मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं।
सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियाँ: गरीबी, संसाधनों की कमी, शिक्षा के सीमित अवसर, भेदभाव और असुरक्षित वातावरण भी किशोरों की मानसिक स्थिति पर प्रभाव डाल सकते हैं।
जैविक एवं आनुवंशिक कारक: कुछ मानसिक समस्याओं में आनुवंशिक प्रवृत्ति, मस्तिष्क के विकास और अन्य जैविक कारकों की भूमिका हो सकती है, इसलिए किशोरों की मानसिक समस्याओं को केवल अनुशासन की कमी, जिद या गलत संगति का परिणाम मानना उचित नहीं है। इनके पीछे कई जटिल कारण हो सकते हैं। मानसिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों को समय रहते पहचानना बहुत ज़रूरी है। माता-पिता, शिक्षक, मित्र और समुदाय ऐसे संकेतों पर ध्यान दे सकते हैं। लगातार उदास, निराश या चिंतित रहना, छोटी-छोटी बातों पर अत्यधिक गुस्सा करना या चिड़चिड़ापन दिखाना, पढ़ाई, खेलकूद और पसंदीदा गतिविधियों में रुचि कम होना, नींद बहुत कम या बहुत अधिक आना, भूख या वजन में असामान्य बदलाव, एकाग्रता में कमी और पढ़ाई के प्रदर्शन में गिरावट, परिवार एवं दोस्तों से दूरी बनाना और अकेले रहना पसंद करना, बार-बार स्वयं को असफल, बेकार या दूसरों पर बोझ समझना, बिना स्पष्ट शारीरिक कारण के बार-बार सिरदर्द, पेटदर्द या थकान की शिकायत करना, मोबाइल या इंटरनेट का उपयोग नियंत्रित न कर पाना और उससे नींद या पढ़ाई प्रभावित होना, स्वयं को नुकसान पहुँचाने या जीवन समाप्त करने संबंधी विचार व्यक्त करना।
ऐसी स्थितियां बनती हैं तो ख़ासतौर पर ध्यान देने की ज़रूरत है, अगर किशोर आत्महत्या, स्वयं को नुकसान पहुँचाने या जीने की इच्छा समाप्त होने की बात करता है, तो इसे मजाक या ध्यान आकर्षित करने का तरीका मानकर नजरअंदाज न करें। उसे शांतिपूर्वक सुनें, अकेला न छोड़ें और तत्काल योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ या नजदीकी अस्पताल की सहायता लें।
किशोरों की मानसिक समस्याओं का निदान एवं उपचार के बारे में बताया गया कि “मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की पहचान और निदान प्रशिक्षित विशेषज्ञ द्वारा किया जाना चाहिए। केवल किसी एक लक्षण के आधार पर मानसिक बीमारी का निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए। ऐसी समस्या के निदान की प्रक्रिया में प्रारंभिक पहचान के तहत् माता-पिता, शिक्षक या स्वास्थ्यकर्मी किशोर के व्यवहार, भावनाओं, नींद, पढ़ाई और सामाजिक गतिविधियों में आए बदलावों पर ध्यान दें। खुलकर बातचीत के तहत् किशोर को बिना डांट-फटकार और बिना किसी पूर्वाग्रह के अपनी परेशानियाँ बताने का अवसर दिया जाए। विशेषज्ञ से मूल्यांकन के तहत् मनोवैज्ञानिक, मनोचिकित्सक या अन्य योग्य मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर किशोर की परिस्थितियों, लक्षणों, उनकी अवधि और दैनिक जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन करते हैं। आवश्यक जांच के तहत् ज़रूरत के मुताबिक़ शारीरिक स्वास्थ्य, नींद, नशीले पदार्थों के उपयोग और अन्य संभावित कारणों की जांच की जा सकती है और उपयुक्त उपचार के तहत् समस्या की प्रकृति और गंभीरता के अनुसार काउंसलिंग, मनोचिकित्सा, पारिवारिक सहयोग, व्यवहार संबंधी उपाय और आवश्यकता होने पर चिकित्सकीय दवाओं का उपयोग किया जा सकता है।
समय पर उपचार मिलने से अधिकांश मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को प्रभावी ढंग से संभालने और किशोरों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने में मदद मिल सकती है। बिना चिकित्सकीय सलाह के दवाएँ देना या उन्हें अचानक बंद करना उचित नहीं है। किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के उपायों पर ग़ौर करें तो किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा केवल परिवार या स्वास्थ्य विभाग की ज़िम्मेदारी नहीं है, बल्कि विद्यालय, समुदाय और समाज की भी साझा ज़िम्मेदारी है और ऐसी स्थिति में मापा पिता की भूमिका अहम् हो जाती है। माता पिता को चाहिये कि बच्चों की बात ध्यानपूर्वक सुनें और उनकी भावनाओं का सम्मान करें। दूसरों से तुलना करने के बजाय उनके प्रयासों की सराहना करें। असफलता को सीखने का अवसर समझने के लिए प्रोत्साहित करें और घर में सुरक्षित, स्नेहपूर्ण और संवादपूर्ण वातावरण बनाएँ।
किशोरों के बेहतर मानसिक स्वास्थ्य को लेकर विद्यालयों के साथ साथ शिक्षकों की भूमिका पर भी चर्चा हुई, इस चर्चा में जो महत्वपूर्ण बातें निकलकर सामने आईं उसके मुताबिक़ विद्यालयों में मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम आयोजित होने चाहिए, बुलिंग और भेदभाव के विरुद्ध प्रभावी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए, जरूरतमंद विद्यार्थियों को काउंसलिंग एवं विशेषज्ञ सहायता से जोड़ा जाना चाहिए, पढ़ाई के साथ खेलकूद, कला, सांस्कृतिक गतिविधियों और जीवन कौशल को महत्व देने के लिए प्रेरित करना चाहिए। किशोरों के लिए कई उपयोगी सुझाव भी चर्चा के दौरान सामने आये जिसके मुताबिक़ किशोर प्रतिदिन पर्याप्त नींद लें और नियमित शारीरिक गतिविधि करें, संतुलित भोजन करें तथा मोबाइल और सोशल मीडिया के उपयोग में संतुलन रखें, अपनी भावनाओं को विश्वसनीय व्यक्ति के साथ साझा ही करें, ज़रूरत पड़ने पर सहायता मांगने में संकोच न करें, नशे से दूर रहें और सकारात्मक मित्रता को बढ़ावा दें।
समुदाय और स्वास्थ्य विभाग की भूमिका पर हुई चर्चा में जो बातें सामने आईं उसके मुताबिक़ विद्यालयों और ग्राम स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता शिविर आयोजित किए जाएं, किशोरों के लिए गोपनीय एवं सहज परामर्श सेवाएँ उपलब्ध कराई जाएं, अभिभावकों, शिक्षकों, मितानिनों और स्वास्थ्यकर्मियों को मानसिक समस्याओं के शुरुआती संकेत पहचानने का प्रशिक्षण दिया जाए, ग्रामीण आदिवासी क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाई जाए।
मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशील समाज का निर्माण करने की दिशा में साझा प्रयासों में ज़रूरी है, किशोरों को यह महसूस होना चाहिए कि उनकी समस्याएँ महत्वपूर्ण हैं और सहायता मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि साहस का प्रतीक है। मानसिक बीमारी से जुड़े कलंक, उपहास और भेदभाव को समाप्त करना आवश्यक है।नहमें यह समझना होगा कि जिस प्रकार बुखार, मधुमेह या अन्य शारीरिक बीमारियों के लिए उपचार लिया जाता है, उसी प्रकार मानसिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के लिए भी विशेषज्ञ की मदद लेना सामान्य और आवश्यक है। यदि किसी किशोर में गंभीर संकट या आत्महत्या का जोखिम दिखाई दे, तो उसे अकेला न छोड़ें, नुकसान पहुँचाने वाली वस्तुओं तक उसकी पहुंच सुरक्षित रूप से सीमित करें और तत्काल पेशेवर सहायता लें। भारत में टेली-मानस हेल्पलाइन 14416 के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सहायता प्राप्त की जा सकती है। आपातकालीन स्थिति में नजदीकी अस्पताल या आपातकालीन सेवा से संपर्क करें।
किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य जैसे बेहद संवेदनशील और ज़रूरी विषय पर हुए गहन मंथन के निष्कर्ष के मुताबिक़ किशोर देश का भविष्य ही नहीं, वर्तमान की महत्वपूर्ण शक्ति भी हैं। उनका स्वस्थ मानसिक विकास परिवार, विद्यालय, समुदाय और राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य की आधारशिला है। किशोरों की परेशानियों को समझना, उनके प्रति संवेदनशील व्यवहार करना, शुरुआती लक्षणों को पहचानना और समय पर उचित उपचार उपलब्ध कराना हम सभी की ज़िम्मेदारी है।








































